जयपुर, अप्रैल 18, 2022.

ई-कोडिंग के नाम पर कंपनियां शाकाहारी उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मांसाहारी और जहरीले इंग्रिडियंट मिलाती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जनवरी 2022 में अपने एक फैसले में फूड बिजनेस ऑपरेटर्स को निर्देश दिया था कि प्रोडक्ट्स में ई- कोड के अलावा इस्तेमाल हर चीज का स्रोत पौधों या जानवर जो भी हो लिखना जरूरी है। हालांकि इस मामले में कंपनियों का कहना है कि सरकारी अधिसूचना में बाल,पंख, सींग, नाखून, चर्बी, अंडे की जर्दी को मांसाहार से बाहर रखा गया है तो फिर उपयोग में क्या दिक्कत है।

ई-नंबर मूल रूप से यूरोपीय देशों की देन हैं। पैकेट पर यह इंग्रिडियंट एक कोड जैसे ई-100 से लेकर ई-1599 तक होते हैं। इनमें ई-322, ई-472, ई-631 जैसे कई तत्व अधिकतम मांसाहारी होते हैं जिन्हें कंपनियां साफ न लिखकर कोड में लिखती है ताकि ग्राहक इस कोड का मतलब न समझ पाएं। हालांकि विवाद के बाद कई कंपनियों ने कहा कि भारत में बिकने वाले उत्पादों में प्लांट फैट, जबकि यूरोपीय देशों में एनीमल फैट का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा एल्कोहल, घातक कैमिकल, कृत्रिम रंग, एंटीऑक्सीडेंट्स और एसिडिटी रेग्यूलेटर्स, प्रिजरवेटिव्स जैसे तमाम इंग्रिडियंट को भी साफ न लिखकर कोड में लिखा जाता है।


अमूमन विदेशी कंपनियों के पैकेज्ड नूडल्स, पाश्ता, पिज्जा ,बिस्किट, चिप्स , चॉकलेट,सूप, च्यूइंगम आदि में एनीमल फैट प्रयोग होता है, लेकिन पैकेट पर हरा गोला दिखाकर शाकाहारी बताया जाता है। तमाम कंपनियां अब ई- कोडिंग की जगह इंटरनेशनल नंबरिंग सिस्टम (आईएनएस) नंबर लिख रही हैं ताकि ग्राहक भ्रमित रहें।