Published On: Sat, Jul 10th, 2021

विश्व जनसंख्या दिवस के संदर्भ में जनसांख्यिकीय लाभांश का अधिकतम लाभ उठाने के लिए स्वास्थ्य में निवेश महत्वपूर्ण है: विशेषज्ञ

जयपुर, जुलाई 2021

वैश्विक जनसंख्या मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। भारत की वर्तमान जनसंख्या 137 करोड़ है और हम आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर पर है। यूएन वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2019 के अनुसार उम्मीद है कि 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का  सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। वहीं राजस्थान में 2021 में राजस्थान कुल जनसंख्या 7.92 करोड़ होने का अनुमान है, जिसमें युवा और किशोर आबादी 32 प्रतिशत आंकी गई है।

जनसंख्या विशेषज्ञ  डॉ. धीरेंद्र कुमार (डीन, आई आई एच एम आर यूनिवर्सिटी) का कहना है कि ” 1980 के दशक के दौरान भारत में प्रजनन दर और मृत्यु दर में लगातार गिरावट के कारण जनसंख्या की आयु संरचना में सकारात्मक बदलाव आया और इसके परिणामस्वरूप आज हमारे मानव संसाधन में एक बड़ा अनुपात किशोरों एवं युवाओं का है ।  यह प्रवृत्ति 2030 की शुरुआत तक बनी रहेगी। यह किशोर एवं युवा जनसंख्या एक बड़ी संपदा साबित हो सकती है लेकिन इसे बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए अभी  कई तरह की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।” डॉ धीरेंद्र आगे कहते हैं कि “चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार, राजस्थान में 35 प्रतिशत से अधिक लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। 2020 की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) के सर्वेक्षण के मुताबिक राजस्थान में 15-16 साल की उम्र की 12.5 फीसदी लड़कियां जल्दी शादी और बच्चे पैदा करने सहित विभिन्न कारणों से स्कूल छोड़ देती हैं। अभी चल रही कोविड-19 महामारी ने हालात और मुश्किल कर दिए हैं जिसके चलते युवाओं में तुरंत निवेश करने की आवश्यकता और जरूरी हो गई है।”

राजस्थान की युवा आबादी के भविष्य में निवेश अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां जातिगत समीकरण एवं सामाजिक रीति-रिवाज, विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और सशक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा डालते हैं। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य उदाहरण हैं कि किशोर जनसंख्या को सशक्त और सुरक्षित करने की प्रक्रिया में उनकी शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु  निवेश करना कितना महत्वूर्ण है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की सीनियर स्टेट प्रोग्राम मैनेजर दिव्या संथानम कहती हैं कि “राजस्थान में जमीनी स्तर की एजेंसियों और सरकार द्वारा बालिका शिक्षा के महत्व को बढ़ावा देने, परिवार नियोजन और यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी के प्रसार के लिए काम किया जा रहा है। कोविड महामारी की वजह से गर्भ निरोधक उपायों और सुरक्षित गर्भपात सेवाओं की उपलब्धता मुश्किल हुई है, इससे कम उम्र में गर्भधारण का जोखिम बढ़ा है लेकिन सरकार ने अपने आउटरीच कार्यक्रमों और किशोर अनुकूल स्वास्थ्य केंद्रों के नेटवर्क के जरिए इन समस्याओं के समाधान की इच्छा जाहिर की है।

विशेषज्ञों में इस बात पर सर्वसम्मति से सहमति है कि जनसंख्या नियंत्रण की दृष्टि से किये गए उपाय कोई ठोस समाधान नहीं हैं बल्कि इससे गर्भ के दौरान बच्चे का लिंग पता करने की प्रवृत्ति बढ़ने की संभावना है। इससे बाल लिंग अनुपात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है, जिससे केंद्र सरकार के अभियान, जैसे ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ कार्यक्रम प्रभावित होंगे।

चीन ने खुद को जनसंख्या संकट को देखते हुए  हाल ही में अपनी कठोर जनसंख्या नीति को रद्द कर दिया है। दूसरी ओर, हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका ने सिर्फ विवाह की उम्र में बढ़ोतरी करके प्रजनन दर को कामयाबी के साथ स्थिर कर दिया है।  यह एक ऐसा कदम था जिसे लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करके और अधिक प्रभावी बनाया गया। जाहिर है कि शिक्षा, आर्थिक और अन्य विकास के अवसरों तक पहुंच में बढ़ोतरी करके, जनसंख्या में वृद्धि पर आसानी से रोक लगाई जा सकती है।

राजस्थान की युवा आबादी के लिए, परिवार नियोजन और गर्भ निरोधकों तक पहुंच सुनिश्चित करना प्राथमिक देखभाल का एक महत्वपूर्ण कारक है,  जिसकी पहले बच्चे में देरी, दो बच्चों के बीच अंतर सुनिश्चित करने,  मातृ एवं बाल मृत्यु दर को कम करने के साथ ही असुरक्षित गर्भपात को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका है।

सुश्री दिव्या संथानम आगे कहती हैं कि “लड़कियां स्कूल जाएं और ज्यादा से ज्यादा वर्ष तक वे अपनी पढ़ाई जारी रख सकें तो इसके पूरी जनसंख्या, विशेष रूप से युवाओं के स्वास्थ्य और समृद्धि पर महत्वपूर्ण असर देखने को मिल सकते हैं। इससे न केवल कम उम्र में विवाह नहीं होंगे बल्कि इससे शादी और पहले गर्भधारण के बीच के अंतराल को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। हमें मौजूदा गर्भनिरोधक विकल्पों की सीमा और पहुंच में विस्तार करने की आवश्यकता है, साथ ही अधिक लंबे समय तक काम करने वाले प्रतिवर्ती गर्भनिरोधक (LARC)  को भी इनमें शामिल करने पर विचार करना चाहिए, जो हमारे युवाओं की बड़ी आबादी को देखते हुए अति महत्वपूर्ण हैं।”

भारत में संभावित जनसंख्या विस्फोट के बारे में प्रचलित तर्कहीन आशंकाओं को दूर करते हुए, द लैंसेट के एक हालिया अध्ययन से संकेत मिलता है कि भारत की कुल प्रजनन दर (प्रत्येक महिला द्वारा उनके जीवन काल में  पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या) जो 2017 में 2.2 है, 2100 तक घटकर 1.29 हो सकती है।

हालाँकि, वर्तमान में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, वह भी युवाओं के लिए हर स्तर पर जरूरतें पूरी करने में मुश्किलें ही पैदा करेगी और इसीलिए हमें कठोर जनसंख्या नीतियों के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण करने के बजाय जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।

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