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Published On: Sat, Feb 9th, 2019

जानिए हनुमान चालीसा की उन पांच चमत्कारी चौपाइयों को जो कर सकती हैं आपकी हर इच्छा पूरी

hanuman chalisa
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जानिए हनुमान चालीसा की उन पांच चमत्कारी चौपाइयों को जो कर सकती हैं आपकी हर इच्छा पूरी—पंडित विशाल दयानन्द शास्त्री


धार्मिक उपदेशों, ग्रंथों में वह ताकत है जो हमारे दुखों का निवारण करती है, इस बात में कोई संदेह नहीं है। जब भी हम परेशान होते हैं तो अपनी समस्या का हल पाने के लिए शास्त्रीय उपायों का इस्तेमाल जरूर करते हैं। इसे आप चमत्कार ही कह लीजिए, लेकिन शास्त्रों में हमारी हर समस्या का समाधान है।


हनुमान चालीसा को महान कवि तुलसीदास जी ने लिखा था। वह भी भगवान राम के बड़े भक्त थे और हनुमान जी को बहुत मानते थे। इसमें 40 छंद होते हैं जिसके कारण इसको चालीसा कहा जाता है। यदि कोई भी इसका पाठ करता है तो उसे चालीसा पाठ बोला जाता है। 


हनुमान चालीसा पाठ में बालाजी महाराज के गुणों का व्याख्यान करके उनके बड़े बड़े कार्यो को बताया गया है | हनुमानजी के चरित्र का बड़ा ही सुन्दर दर्शन इन चालीसा चौपाइयों के माध्यम से होता है | यह इतना शक्तिशाली पाठ है की की मन से पाठ करने वाले भक्त के चारो तरफ के कृपा का चक्र बन जाता है और फिर नकारात्मक शक्तियाँ उसे छू भी नही पाती | जो भी व्यक्ति इसका मंगलवार , शनिवार या हर दिन पाठ करते है उन्हें हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और इनके पाठ करने वाले को कई चमत्कारी लाभ प्राप्त होते है |


हनुमान चालीसा का पाठ करना सभी के लिए बहुत लाभदायी होता है। इसका संबंध सिर्फ आपकी आस्था और धर्म से नहीं बल्कि आपकी शारीरिक और मानसिक समस्याओं को खत्म करने में भी यह बेहद प्रभावशाली है। 


हनुमान चालीसा का पाठ पढने से आत्मविश्वास बढ़ता है और मनुष्य का तनाव दूर होता है | यदि आपको कोई डर सता रहा है तो आप यह पाठ पढ़कर उस डर पर विजय प्राप्त कर सकते है |हनुमान चालीसा पढने से मन शांत होता है और डर भी नहीं लगता। हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा का बड़ा ही महत्व है। हनुमान चालीसा पढ़ने से शनि ग्रह और साढे़ साती का प्रभाव कम होता है। हनुमान जी राम जी के परम भक्त हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर हनुमान जी जैसी सेवा-भक्ति विद्यमान है। हनुमान-चालीसा एक ऐसी कृति है, जो हनुमान जी के माध्यम से व्यक्ति को उसके अंदर विद्यमान गुणों का बोध कराती है। इसके पाठ और मनन करने से बल बुद्धि जागृत होती है। हनुमान-चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति खुद अपनी शक्ति, भक्ति और कर्तव्यों का आंकलन कर सकता है।


हनुमान चालीसा,,,यदि हम निर्देशों के अनुसार उपाय करते चले जाएं, तो सफल जरूर होते हैं। इसलिए आज हम आपको हनुमान चालीसा के माध्यम से कुछ ऐसे उपाय बताएंगे जो आपके जीवन को सुखी बना देने में सक्षम सिद्ध होंगे।


भगवान हनुमान को समर्पित,,,भगवान हनुमान को समर्पित हनुमान चालीसा के बारे में कौन नहीं जानता, गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रची गई हनुमान चालीसा में वह चमत्कारी शक्ति है जो हमारे दुखों को हर लेती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस चमत्कार का रहस्य क्या है? चलिए इसका जवाब हम आपको एक पौराणिक कथा के द्वारा देते हैं…. यदि आप हनुमान जी के बाल अवतार से परिचित हैं तो शायद आपने यह कहानी सुन रखी होगी कि बचपन में जब हनुमानजी को काफी भूख लगी थी तो उन्होंने आसमान में चमकते हुए सूरज को एक फल समझ लिया था।


बाल हनुमान,,,उनके पास तब ऐसी शक्तियां थीं जिसके द्वारा वे उड़कर सूरज को निगलने के लिए आगे बढ़े, लेकिन तभी देवराज इन्द्र ने हनुमानजी पर शस्त्र से प्रहार कर दिया जिसके कारण वे मूर्छित हो गए।


जब हनुमान हुए मूर्छित,,,हनुमानजी के मूर्छित होने की बात जब वायु देव को पता चली तो वे काफी नाराज हुए। लेकिन जब सभी देवताओं को पता चला कि हनुमानजी भगवान शिव के रुद्र अवतार हैं, तब सभी देवताओं ने हनुमानजी को कई शक्तियां दीं।


देवतागण ने दिया आशीर्वाद,,,कहते हैं कि सभी देवतागण ने जिन मंत्रों और हनुमानजी की विशेषताओं को बताते हुए उन्हें शक्ति प्रदान की थी, उन्हीं मंत्रों के सार को गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में वर्णित किया है। इसलिए हनुमान चालीसा पाठ को चमत्कारी माना गया है।
हनुमान चालीसा की शक्ति,,,परंतु हनुमान चालीसा में तो कोई मंत्र है ही नहीं, फिर मंत्रों के बिना भी वह चमत्कारी प्रभाव देने में सक्षम कैसे है? दरअसल हनुमान चालीसा में मंत्र ना होकर हनुमानजी की पराक्रम की विशेषताएं बताई गईं हैं। कहते हैं इन्हीं का जाप करने से व्यक्ति सुख प्राप्त करता है।


हनुमान चालीसा की पांच चौपाइयां,,,चलिए आपको बताते हैं हनुमान चालीसा की उन 5 चौपाइयों के बारे में, जिनका यदि नियमित सच्चे मन से वाचन किया जाए तो यह परम फलदायी सिद्ध होती हैं।


इस दिन करें जप,,,हनुमान चालीसा का वाचन मंगलवार या शनिवार को करना परम शुभ होता है। ध्यान रखें हनुमान चालीसा की इन चौपाइयों को पढ़ते समय उच्चारण में कोई गलती ना हो।
पहली चौपाइ – हनुमान चालीसाभूत-पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे।।
लाभ,,,इस चौपाइ का निरंतर जाप उस व्यक्ति को करना चाहिए जिसे किसी का भय सताता हो। इस चौपाइ का नित्य रोज प्रातः और सायंकाल में 108 बार जाप किया जाए तो सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।


दूसरी चौपाइ – हनुमान चालीसानासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
लाभ,,,यदि कोई व्यक्ति बीमारियों से घिरा रहता है, अनेक इलाज कराने के बाद भी वह सुख नही पा रहा, तो उसे इस चौपाइ का जाप करना चाहिए। इस चौपाइ का जाप निरंतर सुबह-शाम 108 बार करना चाहिए। इसके अलावा मंगलवार को हनुमान जी की मूर्ति के सामने बैठकर पूरी हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए, इससे जल्द ही व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है।


तीसरी चौपाइ – हनुमान चालीसा,,,अष्ट-सिद्धि नवनिधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
लाभ,,,यह चौपाइ व्यक्ति को समस्याओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। यदि किसी को भी जीवन में शक्तियों की प्राप्ति करनी हो, ताकि वह कठिन समय में खुद को कमजोर ना पाए तो नित्य रोज, ब्रह्म मुहूर्त में आधा घंटा इन पंक्तियों का जप करे, लाभ प्राप्त हो जाएगा।


चौथी चौपाइ – हनुमान चालीसाविद्यावान गुनी अति चातुर। रामकाज करिबे को आतुर।।
लाभ,,,यदि किसी व्यक्ति को विद्या और धन चाहिए तो इन पंक्तियों के जप से हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। प्रतिदिन 108 बार ध्यानपूर्वक जप करने से व्यक्ति के धन सम्बंधित दुःख दूर हो जाते हैं।


पांचवीं चौपाइ – हनुमान चालीसाभीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्रजी के काज संवारे।।
लाभ,,,जीवन में ऐसा कई बार होता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कार्य में विघ्न प्रकट होते हैं। यदि आपके साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है तो उपरोक्त दी गई चौपाइ का कम से कम 108 बार जप करें, लाभ होगा।

हनुमान चालीसा का महत्व,,,किंतु हनुमान चालीसा का महत्व केवल इन पांच चौपाइयों तक सीमित नहीं है। पूर्ण हनुमान चालीसा का भी अपना एक महत्व एवं इस पाठ को पढ़ने का लाभ है, जिससे आम लोग अनजान हैं।


हनुमान चालीसा का पाठ,,,बहुत कम लोग जानते हैं कि हिन्दू धर्म में हनुमान जी की आराधना हेतु ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ सर्वमान्य साधन है। इसका पाठ सनातन जगत में जितना प्रचलित है, उतना किसी और वंदना या पूजन आदि में नहीं दिखाई देता।


फलदायी – हनुमान चालीसा,,,’श्री हनुमान चालीसा’ के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी माने जाते हैं। इसीलिए ‘रामचरितमानस’ की भाँति यह हनुमान गुणगाथा फलदायी मानी गई है।
भक्तों का अनुभव,,,यह बात केवल कहने योग्य नहीं है, अपित्य भक्तों का अनुभव है कि हनुमान चालीसा पढ़ने से परेशानियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।


वंदना,,,तो यदि आप भी दिल से, पवनपुत्र हनुमान जी की भावपूर्ण वंदना करते हैं, तो आपको ना केवल बजरंग बलि का अपितु साथ ही श्रीराम का भी आशीर्वाद प्राप्त होगा

🏻समझिए हनुमान चालीसा के गूढ़ अर्थों को—
हनुमान् के कई अर्थ हैं-

(१) पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।

(२) आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वारा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।

(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है।

(४) हनु = ज्ञान-कर्म की सीमा। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। दोनों हनुमान् द्वारा सीमा बद्ध हैं, अतः मनुष्य (कपि) रूप में भी हनुमान् के हृदय में प्रभु राम का वास है।

(५) २ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण के काण्ड ४ अध्याय ४ के तीसरे ब्राह्मण में बताया है अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है।

(६) हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो …)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।तैत्तिरीय उपनिषद् शीक्षा वल्ली, अनुवाक् ३-अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपं, उत्तरा हनुरुत्तर रूपम्। वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्।अथ हारियोजनं गृह्णाति । छन्दांसि वै हारियोजनश्चन्दांस्येवैतत्संतर्पयति तस्माद्धारियोजनं गृह्णाति (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/२) एवा ते हारियोजना सुवृक्ति ऋक् १/६१/१६, अथर्व २०/३५/१६) तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर ६/१२)आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण उत्तर ६/१०) स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर २/१२)

(७) सुन्दर काण्ड-मूल वैदिक शब्द सु-नर था जिससे लौकिक शब्द सुन्दर हुआ है। सु = अच्छा, समन्वय, मिला हुआ। दुः = अलग-अलग, असम्बद्ध। जैसे सुख-दुःख।सु-नर = अच्छा नर, जो लोगों को मिलाये। जैसे इसाई विवाह में पति-पत्नी को मिलाने वाला सु-नर (Best man) कहलाता है।वेद में सुनर वह है जो पति-पत्नी, भक्त भगवान् को मिला दे।रामायण में हनुमानजी सीता-राम को मिलाने के लिए दूत बने, भक्त विभीषण या शत्रु पक्ष के व्यक्ति को भगवान् राम से मिलाया तथा परस्पर विरोधी सुग्रीव तथा अंगद को भी राम से मिलाया। हनु = दोनों ओठ। इनके बीच का भाग ५ ज्ञानेन्द्रिय तथा ५ कर्मेन्द्रिय का समन्वय है। जो ज्ञान-कर्म दोनों में श्रेष्ठ है, वही हनुमान है (तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षा वल्ली)।सु-नर हनुमान का चरित्र वर्णन होने के कारण इस अध्याय को सुन्दर काण्ड कहते हैं।

(८) हनुमान की जन्म तिथि-पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं पर उनका स्रोत मैंने कहीं नहीं देखा है। पंचांग निर्माताओं के अपने अपने आधार होंगे।  पराशर संहिता, पटल 6 में यह तिथि दी गई है-

तस्मिन् केसरिणो भार्या कपिसाध्वी वरांगना।

अंजना पुत्रमिच्छन्ति महाबलपराक्रमम्।।29।।

वैशाखे मासि कृष्णायां दशमी मन्द संयुता।

पूर्व प्रोष्ठपदा युक्ता कथा वैधृति संयुता।।36।।

तस्यां मध्याह्न वेलायां जनयामास वै सुतम्।

महाबलं महासत्त्वं विष्णुभक्ति परायणम्।।37।।

इसके अनुसार हनुमान जी का जन्म वैशाख मास कृष्ण दशमी तिथि शनिवार (मन्द = शनि) युक्त पूर्व प्रोष्ठपदा (पूर्व भाद्रपद) वैधृति योग में मध्याह्न काल में हुआ।


हनुमान की जन्म तिथि-

पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं पर उनका स्रोत मैंने कहीं नहीं देखा है। पंचांग निर्माताओं के अपने अपने आधार होंगे।  पराशर संहिता, पटल 6 में यह तिथि दी गई है-

तस्मिन् केसरिणो भार्या कपिसाध्वी वरांगना।

अंजना पुत्रमिच्छन्ति महाबलपराक्रमम्।।29।।

वैशाखे मासि कृष्णायां दशमी मन्द संयुता।

पूर्व प्रोष्ठपदा युक्ता कथा वैधृति संयुता।।36।।

तस्यां मध्याह्न वेलायां जनयामास वै सुतम्।

महाबलं महासत्त्वं विष्णुभक्ति परायणम्।।37।।

इसके अनुसार हनुमान जी का जन्म वैशाख मास कृष्ण दशमी तिथि शनिवार (मन्द = शनि) युक्त पूर्व प्रोष्ठपदा (पूर्व भाद्रपद) वैधृति योग में मध्याह्न काल में हुआ।बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहु लोक भयो अन्धियारो।

= यदि इसका अर्थ है कि हनुमान जी के जन्म दिन सूर्य ग्रहण हुआ था तो उनका जन्म अमावस्या को ही हो सकता है। दिन के समय ही सूर्य ग्रहण उस स्थान पर दृश्य होगा।

युग सहस्त्र योजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। 

= सूर्य युग सहस्त्र या 2000 योजन पर नहीं है। तुलसीदास जी ने सूर्य सिद्धांत पढ़ा था जिसमें सूर्य का व्यास 6500 योजन (13,92,000 किमी) दिया है।इन दोनों को मिला कर अर्थ-सूर्य की दैनिक गति हमको पूर्व क्षितिज से पश्चिमी क्षितिज तक दीखती है। इसमें सूर्योदय को बाल्यकाल, मध्याह्न में युवा तथा सायंकाल को वृद्धावस्था कहते हैं। सूर्य के अंश रूप गायत्री की इसी प्रकार प्रार्थना होती है।पूर्व तथा पश्चिमी क्षितिज पृथ्वी सतह पर दृश्य आकाश के दो हनु हैं। इन दो हनु के बीच सूर्य की दैनिक गति का पूरा जीवन समाहित है। जब हमको सूर्य उदय होते दीखता है तब वह वास्तव में क्षितिज से नीचे होता है, पर वायुमंडल में किरण के आवर्तन से मुड़ने के कारण पहले ही दीखने लगता है। इसको सूर्य सिद्धांत में वलन कहा गया है। सूर्य का व्यास सूर्य सिद्धांत में 6500 योजन है जहाँ योजन का मान प्रायः 214 किमी है। जब व्यास का 2000 योजन क्षितिज के नीचे रहता है तभी पूरा सूर्य बिम्ब दीखने लगता है। यही युग (युग्म) सहस्त्र योजन पर भानु है जिसको क्षितिज रूपी हनु निगल जाता है।


युग सहस्र योजन पल भानु,  लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

युग = युग्म = 2। युग सहस्र योजन = 2000 योजन। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास 6500 योजन कहा गया है। यहां 1 योजन = 27 × भू योजन। पृथ्वी का व्यास 1600 योजन कहा गया है जो प्रायः 12800 कि.मी. है। अतः भू-योजन = प्रायः 8 कि.मी.।


पृथ्वी से चन्द्र तक की दूरी इस माप में है। सूर्य और अन्य ग्रहों की दूरी भ-योजन में है। अन्य ग्रह तारा जैसे दीखते हैं,  अतः उनको तारा-ग्रह कहते हैं। भ = नक्षत्र जो 27 हैं। अतः भ = 27 और भ-योजन = 27 × भू योजन। सूर्य उदय से थोड़ा पहले जब वह क्षितिज के 2000 योजन अर्थात् व्यास का प्रायः 1/3 भाग नीचे होता है तभी दीखने लगता है। इसका कारण प्रकाश किरण का वलन कहा गया है और इसकी माप सूर्य सिद्धान्त में दी गयी है। बल = शक्ति। बल द्वारा ही गति की दिशा बदलती है (न्यूटन का गति का दूसरा नियम),  अतः मुड़ने को वलन या बलन कहते हैं, जैसे पद लचक कमर बल खाये। हनु = ओठ। 2 ओठ के बीच मुंह में सबका ग्रास होता है। पृथ्वी की सतह पर से दीखता पूरा आकाश 2 क्षितिज = हनु के बीच में है, अर्थात् हनुमान द्वारा निगला हुआ है। जब सूर्य क्षितिज से 2000 योजन नीचे अर्थात् हनुमान द्वारा ग्रस्त होता है तभी दीखने लगता है।

 मनुष्य शरीर में ओठों का मध्य 5 ज्ञानेन्द्रिय और 5 कर्मेन्द्रिय का सन्धि स्थान है। ज्ञान और कर्म दोनों का मन द्वारा समन्वय (मनोजव) करने वाला हनुमान है (तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षा वल्ली)। पृथ्वी के भीतर 3 क्षेत्र हैं। उसके बाहर के क्षेत्र क्रमशः 2-2 गुणा बड़े हैं (बृहदारण्यक उपनिषद,  अध्याय 3)।33 क्षेत्र तक सौर मण्डल है। प्रत्येक क्षेत्र का प्राण 1-1 देवता है। इन 33 देवताओं के चिह्न क से ह तक के अक्षर हैं। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण इस लिपि को देवनागरी कहते हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा 49 क्षेत्रों तक है, जिनकी गति या प्राण 49 मरुत् हैं। उनकी सीमा के बाद का क्षेत्र उसकी सन्तान हनुमान है। यहां ब्रह्माण्ड या आकाश गंगा के 2 छोर 2 हनु हैं। उनके भीतर सभी सूर्य जैसे तारा हैं (ऋग्वेद 1/22/20)। पिता का युग समाप्त होने पर पुत्र का युग आरम्भ होता है। अतः प्रभाव क्षेत्र की सीमा को पुत्र कहते हैं। ठोस ग्रहों में पृथ्वी सबसे बड़ी है। ठोस ग्रहों की सीमा पर मंगल है अतः उसे पृथ्वी का पुत्र (भौम) कहा गया है। जिन ग्रहों के आकर्षण का पृथ्वी पर प्रभाव पड़ता है उनकी सीमा पर शनि है। अतः शनि सूर्य का पुत्र सौरि है। जैसे चन्द्र पृथ्वी की कक्षा में है,  उसी प्रकार सूर्य के सबसे निकट बुध को चन्द का पुत्र कहते हैं। एक आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार बुध पहले पृथ्वी की कक्षा में चन्द्रमा के बाहरी क्षेत्र में था। अतः चन्द्र का पुत्र था। धीरे धीरे दूर खिसकने के कारण यह पृथ्वी के आकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल गया। शुक्र सूर्य के निकट होने के कारण उसकी कक्षा में नहीं आ पाया और सूर्य का ग्रह बन गया।

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